शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

लोहरदगा विकास मोर्चा का झारखंड मुक्ति मोर्चा में हुआ विलय


लोहरदगा विकास मोर्चा का झारखंड मुक्ति मोर्चा में हुआ विलय। लोविमो के केंद्रिय अध्यक्ष पावन एक्का के नेतृत्व में लोविमो के सैकडो सदस्यों समेत कांग्रेस,भाजपा,आजसू व जनता दल यु के सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने झारखंड मुक्ति मोर्चा में अपनी आस्था जताते हुए सदस्यता ग्रहण की।लोहरदगा पहुंचे उपमुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और कल्याण मंत्री हाजी हुसैन अंसारी को झामुमो कार्यकर्ताओं ने भव्य स्वागत किया व सैकड़ों की की संख्या मे झामुमो कार्यकर्ताओं द्वारा मोटरसाईकिल जुलूस निकाला गया जो शहरी क्षेत्र के विभिन्न चैक-चैराहों से होते हुए झामुमो नेताओं को कार्यक्रम स्थल छत्तरबगीचा तक स्काट करते हुए पहुंचाया।छत्तरबगीचा में आयोजित झामुमो की जन सभा सह मिलन समारोह में उपमुख्यमंत्री व कल्याण मंत्री के द्वारा लोहरदगा विकास मोर्चा के सुप्रिमो पावन एक्का को झामुमो का झंडा सौंप कर पार्टी का सदस्य बनाया। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए हेमंत सोरेन ने कहा कि जिले के युवा और उत्साही नेता में झामुमों का झंडा सौंपते हुए मुझे गर्व हो रहा है पावान के माध्यम से जिले ही नहीं आसपास के अन्य जिलो में भी पार्टी मजबूती के साथ आगे आयगी । और नए सदस्यों का स्वागत किया साथ ही सभा को संबोधित करते हुए कहा की झामुमो सरकार में शामिल हैं परंतु पूर्ण बहुमत नहीं मिल पाने के कारण लोकजन को इसका पुर्ण फायदा नहीं मिल पा रहा है।उपमुख्यमंत्री ने कहा कि झामुमो झारखंड के विकास को प्रतिबद्ध है और जो भी झारखंड के विकास की बात करेगा हम उसके साथ हैं।वहीँ कल्याण मंत्री हाजी हुसैन अंसारी ने पार्टी में शामिल नए कार्यकर्ताओं का स्वागत किया ...

मंगलवार, 29 नवंबर 2011

भाषा ने छुड़ाई देहरी और अंगना


आंध्र प्रदेश के मदन पल्ली की रहने वाली महिला भटक कर लोहरदगा में पहुंची महिला आज सेन्हा में प्रतिमा देवी की घर की सदस्य बन गई है . कहते हैं ममता किसी भाषा और शब्द की मोहताज नहीं होती . संवेदना को व्यक्त करने के लिए किसी भाषा की जरुरत नहीं होती मानव संवेदना को समझ हीं लेता है इसी का एक उदाहरण है यह महिला जिसे अपने घर के नाम पर इतना याद है की तमिलनाडु में घर है और बेटी दामाद आंध्र प्रदेश में है, तेलगु और तमिल भाषा बोलने वाली यह महिला को बस याद इतना हीं है की अपने दामाद के साथ बंगलौर एक शादी में आई थी जहाँ से वह अपने परिवार से बिछड़ गई और ट्रेन से झारखण्ड की राजधानी रांची और वहां से लोहरदगा के सेन्हा गाँव पहुँच गई . आदिवासी बहुल क्षेत्र के गाँव में इस अजनबी महिला को प्रतिमा देवी के रूप में एक सहारा मिल गया है दिन भर परिवार के साथ खेती बारी और दुसरे काम- काज में समय बिता रही यह महिला आज इस परिवार की एक सदस्य बन गई है ,घर की याद आने पर काफी बैचैन हो जाती है ,हिंदी न तो यह बोल पाती है और न समझ.लेकिन इशारों इशारों में इसने इस पराये घर को अपना बना लिया है.घर परिवार से मिलने के लिए मानो यह दोनों पहर सरसों या करंज तेल का दिया जलाकर अपनी घर वापस जाने की कामना अपने इष्ट देव से करती है.

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

गुरु द्रोण


लोहरदगा में नरेश लागुरी तीरंदाजी के क्षेत्र में अब तीरंदाजो के लिए गुरु द्रोण बन गए हैं . महाभारत के अर्जुन और अष्वत्थामा जैसे निशाने बाजों को तैयार कर रहें हैं . आदिवासी बहुल क्षेत्र लोहरदगा में कई महिला धनुर्धर को तैयार किया जो राज्य और देश से लेकर अमेरिका में भी अपनी निशाने बाजी का झंडा गाडा हैं नरेश लागुरी के धनुर्धरों ने. इसी का परिणाम है की छह साल पहले लोहरदगा के त्रिवेणी स्कूल से शुरू किए आर्चरी के प्रशिक्षण से इनके धनुर्धर ने पहली बार २००६ में स्कूली गेम्स से सामने आए लोहरदगा की प्रेरणा भगत और हर्षा भरद्वाज ने वर्ल्ड आर्चरी में भाग लिया और अमेरिका तक का सफ़र किया यहीं नहीं प्रेरणा ने २००८ में कांस्य पदक तक जीती .धनुष के अभाव में रबर से प्रैक्टिस किए स्कूल गेम्स में मेडल लाने के बाद झारखण्ड आर्चरी संघ ने धनुष दिए जिससे ये बच्चियां अमेरिका तक खेलने गई .
गुरु द्रोण के रास्ते चल पड़े हैं। तीरंदाजी की दुनिया में नये चेहरों को सामने लाना उनका शौक बन चुका है। इसी का नतीजा है कि इस आदिवासी बहुल क्षेत्र से प्रेरणा हर्षा और इन्द्राणी जैसे निषानेबाज अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं को भेदने में सफलता पाई है। और यह सिलसिला जारी है। नरेश ने करीब छह साल पहले लोहरदगा के ग्रेटर त्रिवेणी पब्लिक स्कूल में बच्चों की कला बगिया को सींचना शुरू किया था। आज वह प्रतिभा का खूबसूरत पार्क बन चुका है. गरीबी और अभाव के बीच केरल में पले-बढ़े नरेश लागुरी अपने अचूक निशाने की बदौलत १९९९ में सांई सेंटर में चुने गये।और अपनी अच्छे प्रदर्शन के कारण छह साल तक साईं से तीरंदाजी में खेलते रहे इस दौरान राज्य और रास्ट्रीय स्तर पर मैडल दिए . आज खिलाडी से कोच बने नरेश लागुरी मानते हैं आदिवासी बहुल क्षेत्र के बच्चो में शुरू से हीं तीर चलाने में के अलग हीं उर्जा दिखाई देता है जरुरत है बस इस तकनीक की और यही तकनीक प्रशिक्षण से हीं स्कूल की बच्चियां निशाने लगा रहीं हैं . और कहते हैं की अगर झारखण्ड आर्चरी संघ जिला इस और ध्यान दे तो यहाँ के बच्चे और भी आगे निकलेंगे .वहीँ आर्चरी की नॅशनल खिलाडी इन्द्राणी कुजूर कहती है की गुरु हमें टूटे धनुष और कमान और सन साधनों के कमी के बीच भी अच्छी तैयारी करते हैं यही कारण है की यहाँ के धनुर्धर सूबे में अच्छा कर रहें हैं. बहरहाल,आज जरुरत है ऐसे प्रतिभा को आगे लाने की और संसाधनों को पूरा करने की ताकि लोहरदगा जैसे पिछड़े क्षेत्र की बच्चियां और आगे जा सके . आज लोहरदगा और गुमला जिला के कई स्कूल में आर्चरी के क्षेत्र में नरेश लागुरी धनुर्धर की एक फ़ौज तैयार कर रहें हैं..

शनिवार, 8 अक्टूबर 2011

मै दुर्गा हूँ ?


मै दुर्गा हूँ ? जिन्दगी की विरोधी स्तिथियों से लड़कर लोहरदगा नगर के मुख्य चौराहे पावर गांज चौक के अर्धनिर्मित मकान की छत में जन्म लिया है दुर्गा ने . दुर्गा इसलिए की एक विक्षिप्त माँ के गर्भ से खुले आसमान के निचे बलुआही मिटटी के बिछौना में जन्म ली . इस विपरीत परिस्तिथि में जन्म लिया एक विक्षिप्त के गोद में बेटी स्वरूपा दुर्गा . महा नवमी के खुशियों के बीच कुवारी कन्याओं का पूजा अर्चना चल रहा है तो वहीँ दूसरी और विक्षिप्त मंजू के गर्भ से बेटी का जन्म शायद सुखद अनुभव रहा होगा . जिन्दगी और मौत के जद्दोजहद में जन्म हुई बेटी के आगमन में कोई सहयोग के लिए सामने नहीं था . ऐसे में सब कुछ अपने आप हो गया . जब आस पास के लोगो को इसकी भनक लगी तो आनन् फानन में उसे सदर अस्पताल पहुँचाया गया .
दरअसल , चंद महीने से विक्षिप्त मंजू शहर की अंधेर गलियों में घूम कर अपना जीवन यापन कर रही थी . इसी अँधेरी रात में समाज के भेड़ियों ने मंजू का अस्मत को तार तार कर दिया . आज हालत यह है की मंजू अपनी बेटी को सिने से लगाये सदर अस्पताल के बरामदे में भटकती नजर आ रही है बच्चे के प्रति ममता इतनी की वह किसी को बच्चे के आस पास भी फटकने नहीं देती और ना हीं डाक्टर और नर्स को हीं छूने देती है . सदर अस्पताल की डाक्टर स्मृत कहती है की बच्चे के जन्म के बाद मंजू शांत है लेकिन मानसिक बिमारी से ग्रसित है ऐसे में बच्चे की देख भाल में दिक्कत हो रही है वहीँ सदर अस्पताल के सिविल सर्जन राजकुमार बेक कहते हैं की जब तक मंजू के परिवार जनो का कोई अता पता नहीं चलता अस्पताल प्रबंधन देख भाल करेगी मानसिक रोग के डाक्टर से इलाज कराया जाएगा .
बहरहाल, संविधान ने तो राईट टू सरवाइव यानी जीने का मौलिक अधिकार तो दिया है लेकिन इस हालात में इस बेटी के जीवन को ले सवाल होना लाजमी हो गया है . वहीँ मंजू के जिद और बच्चे के प्रति प्यार मानो यह कह रही है की मै दुर्गा हूँ और समय से लडूंगी . मंजू के हालत समाज के सामने कई सवाल छोड़ दिया है . आखिर मंजू के साथ घिनौना कुकर्म करने वाला कौन है समाज के बीच छिपे इस महिसासुर का अंत कैसे होगा ..

बुधवार, 6 जुलाई 2011

खखपरता शिव मंदिर


लोहरदगा के खखपरता शिव मंदिर के परिसर में मिले सातवीं शताब्दी की दो मुर्ति । पचास सेंटी मीटर उंची मइसाशुर मर्दनी माँ दुर्गा की मुर्ती और तीस सेंटी मीटर की भगवान विष्णु की एक मुर्ति । मुर्तियों की बनावट स्थानिए बालूआही मिटटी से बनी है । और यह मुर्ति भी सातवीं शताब्दी का हीं है । पहले हीं श्रृखंला मंदिर के मिलने से खखपरता शिव मंदिर के गौरवमयी दास्तांन को एक नइ उंचाई में लाकर रख दिया है जहाँ पुर्व की भाती मंदिर का निमार्ण हो रहा है। वहीं एक बार फिर खखपरता के मंदिर निमार्ण परिसर में दो मुर्ती के मिलने से खखपरता गांव के गर्भ में छुपे एक के बाद एक इतिहास निकल कर सामने आ रही है । मुर्ति के निकलने के साथ हीं पुरातत्व विभाग झारखंड सरकार ने इसे यहाँ से उठा ले गई ।ताकि इस मंदिर परिसर में चल रहे शोध कार्य में किसी प्रकार की बाधा न हो ।पुरातत्व विभाग के निदेशक एन जी निकासे इस क्षेत्र को शिव भक्तो के रूप् में देख रहें है और इस क्षेत्र में वृहत रूप से खुदायी करवाने की बात कर रहें हैं ।

सोमवार, 27 जून 2011

लव इन तम्बू



इंसानी फितरत है कि नाउम्मीद में भी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ता । जेष्ठ की तपती दोपहरी हो, भादो की बौछार या माघ की कड़ाके की ठंड। मौसम की मार से बेखबर यह परिवार के लिए टाट ओढना, धरती बिछौना और खुला आसमान हीं छत है । यह परिवार दो साल से इस उम्मीद में खेत में तंबू लगाकर गुजर कर रहा है कि कभी तो इंसानियत का दिल पसीजेगा । समाज के रहनुमा या सरकारी हुक्मरान किसी की भी नजरें इनायत होगी । लेकिन अफसोस की अभी तक किसी ने यह पुछने की जहमत नही उठाई कि सडक के किनारे यह फटेहाल बसेरा किसका है । बीस साल ईट भटठे में कमाने खाने के बाद दो साल पहले जब केशव अपने गांव लौटा तो अपनों ने भी उससे मुह मोड़ लिया । सिर छुपाने की भी जगह नही मिली तो उसने एक खली पडे़ खेत में प्लास्टिक का तंबू गाड़ दिया । अपने तीन बच्चो को नैय्हर परवरिश के लिए छोड़ विरासमुनी गरीबी तंगहाली में भी पति इ सेवा में लगी है . पति पत्नी इस तम्बू में गुजर कर रहा है । मौसम की बेरहम चोट ने कइ दफा इसका बसेरा उड़ा दिया लेकिन जिवट केशव का संघर्ष जारी है । अधिकारियों के पास काफी गिड़गिड़ाने पर दो महिने तक राशन मिला और साथ हीं इंदिरा आवास का आश्वासन । अब अनाज भी बंद हो गया है और कोई भरोसा भी नही दिलाता कि उसे घर मिल जाएगा ।
दरअसल , गांव का वाशिंदा होने के बावजूद केशव के पास कोई ऐसा कागजी प्रमाण नही जिससे यह साबित कर पाए कि वह इसी गांव का है । दुसरी ओर कागज के दम पर चलने वाली सरकारी व्यवस्था में उसकी सुनने वाला कोई नहीं है ।वहीं जिले के अधिकारी जांच कर सुविधा मुहैया कराने की बात कह रहें है
बहरहाल , सुबे के हर परिवार को रोटी कपडा़ और मकान देने की बात करने वाले सरकार ऐसे व्यक्तियों के लिए रैन बसेरा का भी इंतजाम नही कर रखी है । लोहरदगा का केशव उरांव तो एक उदाहरण मात्र है ऐसे कितने केशव हैं जो खुले आसमान में जिंदगी जिने को मजबूर है और इन्हें कोई देखने सुनने वाला नहीं ।

मंगलवार, 24 मई 2011

झारखण्ड बिहार में गाइड प्रशिक्षण की लिजेंड बनी इभा घोष और परमिंदर कौर भाम्बरा

भारत स्‍काउट एण्‍ड गाइड में गाइड का अर्थ पथ प्रदर्शिका यानि सही
राह दिखाने वाली। सही राह दिखाने वाली ऐसे हीं दो नाम हैं परमिंदर कौर और
इभा घोष । बुढौती नसो में भी युवा उमंग प्रवाह रखने वाली इभा घोष और
परमिंदर कौर झारखंड बिहार में गाइड प्रशिक्षण की लिजेंण्‍ड बन चुकी हैं।
लोहरदगा उर्सुलाइन बीएड कालेज में भावी शिक्षिकाओं को गाइड का प्रशिक्षण
दे रही हैं । पांच सालो से 500 शिक्षिकाओं को प्रशिक्षण दिया है तो
झारखंड-बिहार में कितने हीं गाइड बहनो को दिक्षा दिलायी है।
झारखंड की प्रथम राज्‍य आयुक्‍त बनी परमिंदर कौर भाम्‍बरा आठ साल
की उम्र से हीं गाइड में है अपने परिवार को सुभांलते हुए परमिंदर कौर
अपने दोनों बच्‍चो समेत अपनी पोते पोतीयों को भी गाइड की प्रशिक्षण दे कर
रास्ट्रपति पुरुस्‍कार प्राप्‍त किया है। 1971 में गाइड की दिक्षा लीया और
1996 में संयुक्‍त बिहार की लीडर टेनर बनी ।
गाइड की वर्तमान राज्‍य प्रशिक्षण आयुक्‍त इभा घोष ने तो अपना जीवन
हीं समर्पित कर दिया है। इवा घोष अपनी तीसरी कक्षा में हीं गाइड के
बुलबुल ग्रुप से भाग लिया और गाइड में दिक्षा लेने के बाद विवाह नही करने
का निर्णय लिया । आज परिवार और सब कुछ त्‍याग कर इवा घोष गाइड को हीं
अपना सब कुछ बना बैठी है। संयुक्‍त बिहार में इवा सहायक राज्‍य संगठन
आयुक्‍त के पद पर कार्य किया और वर्तमान में झारखंड की राज्‍य प्रशिक्षण
आयुक्‍त के पद पर कार्यरत हैं ।
बहरहाल, झारखंड की दो बहन इभा घोष और प्रमिंदर कौर समाज गढने
में खुद को समर्पित कर दिया । वहीं पिछले 62 सालों से गाइड में
सेवा दे रही हैं।वहीं गाइड जीवन में रास्ट्रपति पुरुस्‍कार और दस जम्‍बुरी
कैम्‍प में भाग लिया है जो एक बडी उपलब्‍धी है। वहीं उम्र के इस पडाव में
स्‍काउट और गाइड के बच्‍चे बच्‍चीयों के बीच इभा दीदी, परमिदंर दीदी के
नाम से जानी जाती हैं।

शुक्रवार, 6 मई 2011

गुप्तकाल के स्वर्ण मुद्राएँ


लोहरदगा में हैं गुप्तकाल के स्वर्ण मुद्राएँ हैं झारखंड के पुरातत्व विभाग के कलेक्सन में भी नही हैं । चन्द्र गुप्त विक्रमादित्य मोर्य के काल के स्वर्ण मुद्रा यह अत्यंत दुलर्भ मुद्रा है । लोहरदगा के अपर बाजार स्थित कंचन ज्वेलर्स की गलैरी में हैं गुप्त काल के स्वर्ण मुद्राएँ । झारखंड पुरातत्वेता डा हरेन्द्र सिंहा ने बताया की इन दिन स्वर्ण मुद्राओं में एक मुद्रा बहुत हीं महत्वपुर्ण हैं वह है गुप्त काल के गोल्ड क्वाइंस । इस क्वाइंस में तीसरी चौथी शताब्दी के ब्राहमनी लिपी में स्पष्ट रूप से चंद्र लिखा हुआ है । और सिक्के के पिछे लक्ष्मी की तस्वीर है और आगे चंद्र गुप्त विक्रमादित्य की तस्वीर दी गइ है । दरअसल, लोहरदगा के व्यवसायी संजय बर्मन के क्लेकसन में कई तरह के पौराणिक ज्वेरात रखे गए हैं । और यही कारण है की इनके पास चंद्र गुप्त काल के स्वर्ण मुद्रा भी है । संजय बर्मण के क्लेक्षन में आादिवासीयों के द्वारा इस्नेमाल किए जाने वाले आभुषण से भरे परे है वे इस तरह के क्लेक्षन को अपना शौक माने हैं । वहीं डा हरेन्द्र सिंहा कहते हैं की लोहरदगा और गुमला के क्षेत्र में टांगी नाथ और अंजनी धाम हैं और गुमला जिले के कोटाम में पुर्व में गुप्त काल के सवर्ण मुद्रा मिले है । झारखंड के इतिहास में स्वर्ण चाँदी की ज्वेलरीयों और मुद्राओं को देखने के बाद यही लगता है की अखण्ड भारत पहले कितना समृद्धषाली व वैभव का काल था । यह बतलाता है की दो ठाइ हजार वर्ष पहले समाजिक समरसता आर्थिक सम्पन्ता रही होगी ।

गुरुवार, 5 मई 2011

लोहरदगा में हैं रॉक पेंटिंग और मेगालिथ


लोहरदगा में हैं रॉक पेंटिंग और मेगालिथ .जो मानव सभ्यता के इतिहास की रूप रेखा इंगित करती है .मेगालिथ जहाँ पूर्व में आदिवासी जनजाति समुदाय के लोग शव को दफनाते थे और चारो और से पत्थल से घेर देते थे .आज भी मौजूद हैं लोहरदगा के कोयल नदी के तट में .इतिहास में एक नया अध्याय बनेगा यह खोज.वहीँ नदी के बीच एक बड़े पत्थल में बना है रॉक पेंटिंग जो प्राज्ञेएतिहासिक काल के हैं .. दोनों का मिलना इस बात को साफ करता है की इस जगह की खुदाई की गई तो यह जगह मानव सभ्यता के इतिहास में एक नया अध्याय होगा . रॉक पेंटिंग में एक कूबड़ वाला बैल और दूसरी तरफ एक शेर का तस्वीर बनाया गया है ...

मंगलवार का दिन अमंगलकारी रहा लोहरदगा जिले के लिए

ग्यारह जवान शहीद और पचास से अधिक घायल हुए जवान
लोहरदगा जिला के सेन्हा थाना अंतर्गत धरधरिया क्षेत्र मंगलवार को बम के धमाकों से गूंज उठा . एक किलोमीटर के रास्ते में नक्सलीयों ने हरेक पांच मीटर पर एक लैंड माइंस बिछा रखे थे . जवानो के लैंड माइंस के रेंज में आते हीं नक्सलियों ने सीरिज लैंड माइंस ब्लास्ट कर दिया २० मिनट तक पूरी वादी में सिर्फ धमाके हीं धमाके थे उसके बाद सी आर पी ऍफ़ और पुलिस जवानो की चीखों से क्षेत्र भयवाह बना हुआ था .नक्सलियों ने बड़े हीं सुन्योजित ढंग से घटना को अंजाम दिया . सीरिज लैंड माइंस की तैयारी के लिए विशेष रूप से आंध्रप्रदेश के नक्सली इस इलाके में आए थे . लगभग दो महीने से लैंड माइंस के काम पर नक्सली लगे थे जिला पुलिस को इसकी हलकी फुलकी सुचनाये मिल रही थी लेकिन पुलिस को कुछ भी हाथ नहीं लग रहा था .मार्च के अंतिम सप्ताह में पुलिस ने जरुर भारी मात्र में विस्फोटक और डेटोनेटर बरामद किए थे. लेकिन भी पुलिस को लैंड माइंस की भनक नहीं लगी . इधर शुक्रवार २९ अप्रैल से नक्सलियों ने किस्को और सेन्हा गस्ती बढा दी थी . वहीँ पहाड़ी क्षेत्र के स्कूलों में मध्यान भोजन के अनाज की लुट को अंजाम दिया था उस समय भी जिला पुलिस ने सर्च अभियान चलाया खुद डी आई जी सम्पत मीणा बीते सप्ताह अभियान को लेकर लोहरदगा आयी हुई थी . पूरी घटना क्रम में नक्सलियों ने बड़े हीं सुन्योजित तरीके से पुलिस को सेन्हा क्षेत्र में बुलाया और लैंड माइंस के ऊपर से गुजरने को मजबूर किया जिस जगह यह घटना हुई वहां एक और १५० फिट की खाई तो दूसरी और पहाड़ है. वहीँ सामने लैंड माइंस बिछा था . जवानो को पीछे लौटने तक का ना मौका मिला . नक्सलियों ने विस्फोट के बाद लगातार गोली बारी करती रही एस बीच जवानो को सँभालने का मौका नहीं दिया . पूरी ब्लास्ट में घटना स्थल में चार जवान हीं शहीद हुए थे . लेकिन चिकित्साह के लिए जल्दी नहीं ले जाने के करण और सपोर्ट नहीं मिलने के करण शहीद जवानो की संख्या में लगातार वृद्धि होती गई .साढ़े दस बजे की घटना में घायल जवान के लिए तीन बजे तक नहीं मिल पाया बचाव दल .
पानी के लिए तरस गए जवान बारूदी सुरंग विस्फोट में घायल जवानो के साथ बचाव अभियान में लगे जवान भी प्यास से तड़प रहे थे वहीँ जिले के कप्तान असीम विक्रांत मिंज धर धरिया झरना के निचे नदी के किनारे जवानो को रोके हुए थे .ऊपर घायल जवान पानी पानी कर मर रहे थे और निचे जवान नदी के किनारे ठंढी छाव में घंटो बैढे इंतजार कर रहे .सी आर पी ऍफ़ के जवान रणजीत ने आँखों देखा हाल बतया की नक्सली ने पुलिस को अपने जाल में फ़साने के बाद विस्फोट से पहले आत्म सम्पर्पण करने के लिए लौड़ स्पीकर से बोल रहे थे की हथियार डाल दो नहीं तो मारे जाओगे . और यही हुआ नक्सलियों ने एक साथ लगभग १५० लैंड माइंस को एक सीरिज में उड़ा दिया मुठभेड़ के बाद एसपी के माना करने के बावजुद चार पांच की संख्या में जवान मिडिया कर्मियों के साथ धरधरिया झरना के ऊपर साके के रास्ते पहुंचे और घायल जवान को निचे मोटरसाइकल से उतारने लगे जिसमे दो जवान निचे आने के कर्म में हीं दम तोर दिए .वहीँ स्थानीय गाँव के लोगों ने भी खटिया में घायलों के निचे उतारने का काम किया . वहीँ बचाव दल जल्दी पहुँचता और हलिकप्तर की जल्दी व्यवस्था हो जाती तो शयद ये जवान की जान बच जाता .घटना के बाद पहुंचे आलोक राज आई जी आप्रेशन सी आर पी ऍफ़ के आई जी आप्रेशन आलोक राज ने चल रहे आप्रेशन पर सवाल उठाया है और कहा की चलाये जा रहे आप्रेशन के नेत्रित्व में गलती हुई है जिसके कारण जावन शहीद हो गए. ये आप्रेशन में हुई चुक का नतीजा है . आर के मालिक आई जी आप्रेशन झारखण्ड
घटना का जायजा लेने पहुंचे आई जी आर के मालिक ने कहा की घटना किसके द्वारा की गई है इसकी जानकारी है हम लोग इस पर गहन अध्यन कर रहे है ताकि इस तरह की घटना की पुन्राविरती ना हो और नक्सलियों के विरुद्ध चल रहे अभियान में कहा की यह आगे भी जारी रहेगा .
पुलिस मेंस के मंत्री ने झारखण्ड सरकार से इस अभियान के लिए काम से काम पांच हेलीकाप्टर की मांग किया है . और कहा की घटना स्थल में जल्दी हेलीकाप्टर पहुँचता तो जवान नहीं मारे जाते.
बहरहाल , जिले के एसपी को तीन दिन पूर्व हीं ख़ुफ़िया विभाग के हवाले से जानकारी दी गई थी की किस्को और सेन्हा के पहाड़ी क्षेत्र में नक्सलियों के बारूदी सुरंग बिछा रखा है बावजुद इसके पुलिस एलआरपी में बिना माइंस डीडेकटर लिए हीं निकल गए .अभियान में हुई बड़ी चुक का नतीजा निकला की ग्यारह जवान शहीद हो गए ...

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

जल हीं जीवन है..

धरती के कोख में छुपे पानी के स्रोत को ढूंढ़ लेते हैं लोहरदगा जिले के रिटायर्ड शिक्षक लालमोहन केशरी। जमीन के निचे पानी को बांस की छड़ी और नारियल के स्तिथि से बतातें हैं की कहा कहाँ पानी का स्रोत ज्यादा है और कहा पर पत्थल निकलने वाला है।
चैकिए नही ये इस बांस की छड़ी से पानी की सतह खोज रहें हैं सुनने और देखने में अटपटा जरूर लग रहा होगा लेकिन ये रिटायर्ड शिक्षक छड़ी बच्चे के उपर नहीं उठा रहें हैं बल्कि लोगों की प्यास बुझाने के लिए छड़ी उठाए इधर उधर पानी की तलाश कर रहें हैं साठे चार फीट के बांस की छड़ी में दो फीट का चीड़ा लगाकर ये हाथें में लिए छड़ी को उपर निचे कर रहें हैं और तीन चार जगह को चिन्हित कर इट के छोटे टुकरे से निशान बना रहें हैं उसके बाद चिन्हित किए जगहों पर नारियल को लेकर हाथ की तलहथी में ले जाते हैं फिर किसी एक जगह को चिन्हित कर लोहे का कील ठोक देते हैं और अब यही जगह में बोरिग के लिए चुना जाता है। इस पुरे चयन प्रक्रिया क लिए बताते हैं की धरती के निचे छिपे पानी की सतह को खोजने की यह विधी बहुत पुरानी है। दरअसल यह मैगनेटिक थियूरी पर काम करता है। पानी की सतह की जानकारी के लिए साठे चार फीट का बांस की छड़ी लेते हैं जिसमें दो फीट का चीरा लगाते हैं। और बांस के चीरे को मोड़ कर टेंसन पैदा करते हैं। वे बताते हैं कि पत्थल के साथ हरे बांस का रिपलसन है जिसके कारण हाथ में जब बांस को लेकर चलते हैं तो बांस का उछाल उपर की ओर अधिक होता है वहीं पानी के साथ अट्रेक्शन है जिसके करण पानी मिलने पर निचे की ओर स्वत झुकाव अधिक होता है। इस तरह बांस की छड़ी से पानी की सतह की तलाशि तीन चार जगहो में की जाती है फिर नारियल से पानी की सतह के अधिकता की जानकारी की जाती है।
लालमोहन केशरी लोहरदगा हीं नही बल्कि कइ राज्यों में ये पानी की सतह की जानकारी के लिए जाते हैं पिछले 35 वषों से ये पानी की तलाशी का काम कर रहें हैं ये बिहार उड़ीसा छत्तीसगढ के क्षेत्र में भी जा चुके हैं ।