शुक्रवार, 6 मई 2011

गुप्तकाल के स्वर्ण मुद्राएँ


लोहरदगा में हैं गुप्तकाल के स्वर्ण मुद्राएँ हैं झारखंड के पुरातत्व विभाग के कलेक्सन में भी नही हैं । चन्द्र गुप्त विक्रमादित्य मोर्य के काल के स्वर्ण मुद्रा यह अत्यंत दुलर्भ मुद्रा है । लोहरदगा के अपर बाजार स्थित कंचन ज्वेलर्स की गलैरी में हैं गुप्त काल के स्वर्ण मुद्राएँ । झारखंड पुरातत्वेता डा हरेन्द्र सिंहा ने बताया की इन दिन स्वर्ण मुद्राओं में एक मुद्रा बहुत हीं महत्वपुर्ण हैं वह है गुप्त काल के गोल्ड क्वाइंस । इस क्वाइंस में तीसरी चौथी शताब्दी के ब्राहमनी लिपी में स्पष्ट रूप से चंद्र लिखा हुआ है । और सिक्के के पिछे लक्ष्मी की तस्वीर है और आगे चंद्र गुप्त विक्रमादित्य की तस्वीर दी गइ है । दरअसल, लोहरदगा के व्यवसायी संजय बर्मन के क्लेकसन में कई तरह के पौराणिक ज्वेरात रखे गए हैं । और यही कारण है की इनके पास चंद्र गुप्त काल के स्वर्ण मुद्रा भी है । संजय बर्मण के क्लेक्षन में आादिवासीयों के द्वारा इस्नेमाल किए जाने वाले आभुषण से भरे परे है वे इस तरह के क्लेक्षन को अपना शौक माने हैं । वहीं डा हरेन्द्र सिंहा कहते हैं की लोहरदगा और गुमला के क्षेत्र में टांगी नाथ और अंजनी धाम हैं और गुमला जिले के कोटाम में पुर्व में गुप्त काल के सवर्ण मुद्रा मिले है । झारखंड के इतिहास में स्वर्ण चाँदी की ज्वेलरीयों और मुद्राओं को देखने के बाद यही लगता है की अखण्ड भारत पहले कितना समृद्धषाली व वैभव का काल था । यह बतलाता है की दो ठाइ हजार वर्ष पहले समाजिक समरसता आर्थिक सम्पन्ता रही होगी ।

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