नव रात्र माँ दुर्गा के नवरूपो कि आराधना ,पूजा साधना का समय है. इन नौ दिनों में भक्त , तांत्रिक और साधक इन्हीं नौ रूपों कि पूजा अर्चना अलग - अलग पद्धतियों से करते हैं. लोहरदगा में माँ दुर्गा कि नौ रूपों से अलग एक दुर्लभ प्रतिमा है. जिसे शक्ति विग्रह के रूप में लोग पूजा करते हैं. इस नवरात्र के पुरे नौ दिनों तक अपनी मन्नतो और कामनाओ को लेकर माता के दरबार में भक्त श्रद्धा के साथ पूजा करते हैं.
लोहरदगा जिले के सीमांत से गुजरती कोयल नदी के तट पर निर्मित देवी उमा नाथ मंदिर. शहर और गाँव कि सीमा से हट कर सुनसान सी जगह में यह मंदिर ग्रामीण आस्था और विश्वास का एक प्रतिक स्थल बन गया है. स्थानीय ग्रामीणों में इस मंदिर को लेकर खास श्रद्धा और भक्ति है. इस मंदिर कि मनोकामना कि सिद्धि कि मिसाले खुद यहाँ के ग्रामीण हीं देते हैं. कई ग्रामीण हैं जिनकी पुत्र-पौत्र कि मनोकामनाए इस मंदिर से पूरी हुई है. इसी आस्था और विश्वास के स्थानीय ख्यति प्रचार कि बदौलत ग्रामीण मंदिरों में अपनी मनोकामना लेकर आते हैं. इस मंदिर से मांगी गई मनोकामना कभी भी विफल नहीं रही है, ऐसी मान्यता यहाँ के ग्रामीणों कि है...
दरअसल, इस मंदिर कि खासियत इस मंदिर में स्थापित प्रतिमा में है.प्रतिमा काले पत्थर कि है. एक शिला में माँ दुर्गा के साथ के साथ भगवन शिव गणेश, कार्तिके और माँ दुर्गा कि दोनों योगिनिया विराजमान है. इस प्रतिमा के विषय में ग्रामीण बताते है कि प्रतिमा कोयल नदी से स्वपन्न के अधर पर हीं मिली है.. जानकार प्रतिमा के शिल्प के आधार पर इसकी तुलना माँ छिन्नमस्तिका मंदिर रजरप्पा और माँ दुर्गा मंदिर देवडी से जोड़कर देखते हैं. यही कारण है कि नव रात्र के नौ दिनों तक इस मंदिर में भक्त अपनी मनोकामना लेकर आते हैं,साथ हीं वे लोग भी आते हैं जिनकी मनोकामना पूरी हो गई है. आखिर इस मंदिर में माँ दुर्गा के पूजा के साथ साथ भगवन शिव गणेश और कार्तिके कि पूजा भी हो जाती है. स्थानीय भक्त माता के इस रूप को मोक्ष्दायानी और मुक्ति दायनी मानते हैं.
यह प्राचीन मंदिर पुजारी पंडो से अब तक बची हुई है. यहाँ के स्थानीय ग्रामीण आदिवासी हीं मंदिर कि देख रेख करते हैं. लोहरदगा में हीं इसी प्रतिमा कि शिल्प और कला से मिलती जुलती मंदिर और प्रतिमाए हैं, जो पूरा तात्विक शोध के आधार पर ग्यारहवी सदी कि बताई जाती है. इसलिए इसकी पूरी सम्भावना है कि यह प्रतिमा भी ग्यारहवी सदी के आस पास कि हो. हालाकिं स्थानीय प्रशासन के द्वारा इस प्रतिमा के शोध और संरक्षण के प्रयास अभी बाकि है. जिससे इस मंदिर कि ख्यति स्थानीयता कि सीमाओं से बहार नहीं निकल पा रही है...
रविवार, 31 अक्टूबर 2010
मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010
आस्था के कई मिथक तोड़ती है यह मंदिर
यूँ तो भारत में कई अनूठे मंदिर भरे - पड़े हैं . लोहरदगा में भी ऐसा हीं एक मंदिर है जो शिल्प और दर्शन में अनोखा है... मंदिर में माँ दुर्गा कि दो प्रतिमाओं कि पूजा एक साथ कि जाती है. नवरात्र के महीने और दशहरा के त्योहार पर यह मंदिर और भी खास हो जाता है
लोहरदगा शहर से २५ किलो मीटर दूर रांची जिला के सीमांत छोटा सा क़स्बा है चट्टी, इसी चट्टी में है मा दुर्गा का अनोखा मंदिर . इस मंदिर का नाम है छत्तीस माता मंदिर . इस छत्तीस माता मंदिर कि खासियत है मंदिर में स्थापित माँ दुर्गा कि प्रतिमा . मंदिर के एक हीं कमरे में माँ दुर्गा कि दो प्रतिमाएं स्थापित कि गई है. माँ दुर्गा कि एक प्रतिमा है जो विशाल स्वरूप में है और एक प्रतिमा जो आकार में छोटी है.इस मंदिर कि स्थापना करने वाले जगतपाल बताते है .कि माँ दुर्गा दस भुजाओ के साथ संहारक रूप में पापीयों का दमन के लिए और माँ दुर्गा का छोटा रूप संसार में सुख शांति कि स्थापना के लिए है.
नवरात्र में दुर्गा के नौ रूपों कि पूजा अर्चना कि जाती है. इस लिए भी नव रात्र में छत्तीस माता मंदिर का महत्व काफी बढ़ जाता है. हालाकिं मंदिर माता कि दो प्रतिमाएं हैं लेकिन पूजा दोनों प्रतिमाओं कि एक साथ कि जाती है मंदिर को स्थानीय लोग मनोकामना सिद्धि का मंदिर मानते हैं. मनोकामनाएं पूरी होने के साथ हीं मंदिर के प्रति लोगो में आस्था और विश्वास बढ़ता जा रहा है .यही कारण है कि महिलाएं नवरात्री में इस मंदिर में विशेष पूजा अनुष्ठान के लिए आती हैं पुरे नव रात्र इस मंदिर में पूजा और जागरण किया जाता है.
इस छत्तीस माता मंदिर के ठीक बीच के कमरे में माँ दुर्गा कि स्थापित दोनों प्रतिमाएं कई मिथकों को दोड़ते हुए , आस्था और विश्वास कि नई परिभाषा गढ़ती है.. इस तरह यह मंदिर पुरे भारत में अपनी तरह का एकलौता मंदिर है, जो नई सोच और दर्शन का परिणाम है ,
लोहरदगा शहर से २५ किलो मीटर दूर रांची जिला के सीमांत छोटा सा क़स्बा है चट्टी, इसी चट्टी में है मा दुर्गा का अनोखा मंदिर . इस मंदिर का नाम है छत्तीस माता मंदिर . इस छत्तीस माता मंदिर कि खासियत है मंदिर में स्थापित माँ दुर्गा कि प्रतिमा . मंदिर के एक हीं कमरे में माँ दुर्गा कि दो प्रतिमाएं स्थापित कि गई है. माँ दुर्गा कि एक प्रतिमा है जो विशाल स्वरूप में है और एक प्रतिमा जो आकार में छोटी है.इस मंदिर कि स्थापना करने वाले जगतपाल बताते है .कि माँ दुर्गा दस भुजाओ के साथ संहारक रूप में पापीयों का दमन के लिए और माँ दुर्गा का छोटा रूप संसार में सुख शांति कि स्थापना के लिए है.
नवरात्र में दुर्गा के नौ रूपों कि पूजा अर्चना कि जाती है. इस लिए भी नव रात्र में छत्तीस माता मंदिर का महत्व काफी बढ़ जाता है. हालाकिं मंदिर माता कि दो प्रतिमाएं हैं लेकिन पूजा दोनों प्रतिमाओं कि एक साथ कि जाती है मंदिर को स्थानीय लोग मनोकामना सिद्धि का मंदिर मानते हैं. मनोकामनाएं पूरी होने के साथ हीं मंदिर के प्रति लोगो में आस्था और विश्वास बढ़ता जा रहा है .यही कारण है कि महिलाएं नवरात्री में इस मंदिर में विशेष पूजा अनुष्ठान के लिए आती हैं पुरे नव रात्र इस मंदिर में पूजा और जागरण किया जाता है.
इस छत्तीस माता मंदिर के ठीक बीच के कमरे में माँ दुर्गा कि स्थापित दोनों प्रतिमाएं कई मिथकों को दोड़ते हुए , आस्था और विश्वास कि नई परिभाषा गढ़ती है.. इस तरह यह मंदिर पुरे भारत में अपनी तरह का एकलौता मंदिर है, जो नई सोच और दर्शन का परिणाम है ,
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