मंगलवार, 29 नवंबर 2011

भाषा ने छुड़ाई देहरी और अंगना


आंध्र प्रदेश के मदन पल्ली की रहने वाली महिला भटक कर लोहरदगा में पहुंची महिला आज सेन्हा में प्रतिमा देवी की घर की सदस्य बन गई है . कहते हैं ममता किसी भाषा और शब्द की मोहताज नहीं होती . संवेदना को व्यक्त करने के लिए किसी भाषा की जरुरत नहीं होती मानव संवेदना को समझ हीं लेता है इसी का एक उदाहरण है यह महिला जिसे अपने घर के नाम पर इतना याद है की तमिलनाडु में घर है और बेटी दामाद आंध्र प्रदेश में है, तेलगु और तमिल भाषा बोलने वाली यह महिला को बस याद इतना हीं है की अपने दामाद के साथ बंगलौर एक शादी में आई थी जहाँ से वह अपने परिवार से बिछड़ गई और ट्रेन से झारखण्ड की राजधानी रांची और वहां से लोहरदगा के सेन्हा गाँव पहुँच गई . आदिवासी बहुल क्षेत्र के गाँव में इस अजनबी महिला को प्रतिमा देवी के रूप में एक सहारा मिल गया है दिन भर परिवार के साथ खेती बारी और दुसरे काम- काज में समय बिता रही यह महिला आज इस परिवार की एक सदस्य बन गई है ,घर की याद आने पर काफी बैचैन हो जाती है ,हिंदी न तो यह बोल पाती है और न समझ.लेकिन इशारों इशारों में इसने इस पराये घर को अपना बना लिया है.घर परिवार से मिलने के लिए मानो यह दोनों पहर सरसों या करंज तेल का दिया जलाकर अपनी घर वापस जाने की कामना अपने इष्ट देव से करती है.

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