देश में बच्ची बचाओ आन्दोलन चल रहा है फिर भी बच्चियों पर तिरस्कार का कहर जरी है । ऐसा ही मामला है लोहरदगा में देखने को मिला जब पॉँच साल की बेटी को ट्रेन में चढ़ा कर बाप ने छोड़ दिया ।
पॉँच साल की पूजा को उसके पिता ने रांची से लोहरदगा आ रही ट्रेन में बिठा कर खुद कहीं उतर गया । रांची से जब लोहरदगा पहुंची ट्रेन तो अपनी पिता को नहीं देख पूजा रोने लगी । जिसे देख किसी का दिल नहीं पसिझा तो उसी ट्रेन में रांची से आ रही रिटार्यड फौजी की पत्नी प्रेम मणि मिंज ने लड़की को लेकर स्टेसन मास्टर के पास पहुंची और एनाउंस करवया कई एक बार एनाउंस के बाद बाद भी कोई नहीं आया तो स्टेसन मास्टर ने लड़की को यह कहकर की किसी के आने के बाद लड़की को ले लेंगे । इस बाबत प्रेम मणि ने लड़की के घर तक पहुचने के लिए सदर थाने में भी रिपोर्ट की पर आज तक कोई नहीं आया । अब पूजा प्रेम मणि की पाचवी लड़की के रूप में ममता की परवरिश पा रही है ।पूजा अपने शहर का नाम रांची डोरंडा और पिता संतोस माँ दुर्गी का नाम याद है कहती है की पापा रिक्शा चलते हैं और माँ को रोज मारते हैं । अब हम घर नहीं जायेंगे यही बड़ी माँ के साथ रहेंगे । प्रेम मणि को अपनी बड़ी माँ कहती है और मुहल्ले के बच्चो के साथ - साथ खेलती अपनी भोली सूरत से घर ही नहीं महल्ले वासियो की भी चहेती बन गई है. प्रेम मणि के घर के आँगन में तो प्रेम का दृश्य देखते बनती है जब एक साथ जिमी शेरू बकरी के मेमना खेलते नजर आते हैं. तो भला इस घर को छोड़ पूजा कहाँ जाना चाहेगी .
बहरहाल प्रेम की गोद में पूजा उन लोगो के लिए सवाल है जो बेटा और बेटी में फर्क समझते हैं। जबकि अभी भी ममता के आँचल ममत्व से इतने भरे हैं की बच्ची पैदा करने वाली कोखों वाली माँ बौनी दिखाती है .
शनिवार, 6 फ़रवरी 2010
एक आवाज तो उठी है ..... दाद तो दीजिये .
आज महिलाओं को आधी आबादी कि संज्ञा दी जा रही है। लेकिन इस आधी आबादी को पूरा अधिकार नहीं मिल रहा है । अपनी शिक्षा के पूरी अधिकार के लिए लोहरदगा में महिलाओं ने एक आन्दोलन कि शुरुआत कर सभी को झकझोरने का प्रयास कर रही है ।
लोहरदगा के ये बच्चियां पहली बार अपने उंच्च शिक्षा के अधिकार और दुर्दशा के लिए आवाज उठा रही है। लोहरदगा के राजनितिक छवियो सामाजिक कार्यकर्ताओ पूंजीपतियो और शिक्षा विडो के सामने ये बच्चियां यही सवाल कर उठा रही है कि आखिर मुझे शिक्षा कयूं नहीं ? शिक्षको और बच्चियो कि मने तो उनमे आसमान छूने कि जूनून तो है लेकिन व्यवस्था और सुविधाओ के आभाव उन्हें शहर कि काल कोठरी से निकालने नहीं देती है ।
लोहरदगा में महिला उंचच शिक्षा को लेकर सामाजिक प्रशासनिक और राजनैतिक प्रयास अब तक नहीं हुए हैं। लोहरदगा जिले में अगर महिलाओ कि स्तिथि कि बात कि जाए तो करीब नब्बे हजार से अधिक महिला मतदाता हैं इसलिए भी तमाम मुद्दों के साथ राजनीतिज्ञों से सवाल उठ रहे हैं। कि आखिर शिक्षा सम्बन्धी उनके आशावासनो का क्या हुआ ।
बहरहाल लोहरदगा में महिला उंचच शिक्षा के तमाम सवालों के पीछे करण यही है कि यहाँ महिला शिक्षा के नाम पर मात्र एक कालेज है जहाँ १२वी तक कि पढाई होती है , यह स्तिथि पिछले तीस सालों से बरकार है । पहली बार अधिकार कि आवाज ने आन्दोलन किया है । शायद इस दस्तक से कोई राह खुल जाए ।
लोहरदगा के ये बच्चियां पहली बार अपने उंच्च शिक्षा के अधिकार और दुर्दशा के लिए आवाज उठा रही है। लोहरदगा के राजनितिक छवियो सामाजिक कार्यकर्ताओ पूंजीपतियो और शिक्षा विडो के सामने ये बच्चियां यही सवाल कर उठा रही है कि आखिर मुझे शिक्षा कयूं नहीं ? शिक्षको और बच्चियो कि मने तो उनमे आसमान छूने कि जूनून तो है लेकिन व्यवस्था और सुविधाओ के आभाव उन्हें शहर कि काल कोठरी से निकालने नहीं देती है ।
लोहरदगा में महिला उंचच शिक्षा को लेकर सामाजिक प्रशासनिक और राजनैतिक प्रयास अब तक नहीं हुए हैं। लोहरदगा जिले में अगर महिलाओ कि स्तिथि कि बात कि जाए तो करीब नब्बे हजार से अधिक महिला मतदाता हैं इसलिए भी तमाम मुद्दों के साथ राजनीतिज्ञों से सवाल उठ रहे हैं। कि आखिर शिक्षा सम्बन्धी उनके आशावासनो का क्या हुआ ।
बहरहाल लोहरदगा में महिला उंचच शिक्षा के तमाम सवालों के पीछे करण यही है कि यहाँ महिला शिक्षा के नाम पर मात्र एक कालेज है जहाँ १२वी तक कि पढाई होती है , यह स्तिथि पिछले तीस सालों से बरकार है । पहली बार अधिकार कि आवाज ने आन्दोलन किया है । शायद इस दस्तक से कोई राह खुल जाए ।
गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010
शहीद का दर्द और राजनीती
शहीदों के माजर पर लगेगे हर वर्ष मेले , वतन पर मरने वालों का यही आखरी निशां होगा
शहीदों की मजार में हर बरस मेले लगने की बात तो होती है लेकिन लोहरदगा में शहीदों की श्रधान्जली के लिए लगने वाला मेला राजनितिक अखाडा बन गया है राजनीती इतनी हावी रही की तीन दशक पुरानी संस्कृति तहस नहस हो गयी ।
लोहरदगा जिला के कुडू प्रखंड अंतर्गत टिको पोख्राटोली में लरका आन्दोलन के शहीद हलधर गिरधर के समाधी स्थल में हर वारस मेला लगने की परम्परा है पिछले तीन दशको से अधिक समय से यहाँ आदिवासी और सदन एक साथ श्रधान्जली देते है वैदिक मंत्रौच्चारण के साथ यज्ञ हवन और पूजा के साथ साथ सरना धर्म अनुसार शहीद मेले का आयोजन यहाँ की साझी संस्कृति रही है ।
दरअसल इसबार शहीद स्थल में मेला भी लगा और श्रधान्जली भी दी गयी लेकिन राजनीती हावी रही । वीर बुधु स्मारक समिति और आदिवासी छात्रा संघ ने अपने अपने मंच बना लिए स्मारक समिति ने जहाँ स्वस्थ मंत्री बैधनाथ राम को मुख्या अतिथि बनाया गया वही आदिवासी छात्रा संघ ने विधायक कमल किशोर को मुख्या अतिथि चुना बाद में राजनितिक हस्तझेप के नकारात्मक प्रभाव को देखते हुए विधायक कमल किशोर भगत श्रधान्जली अर्पित कर लौट गाये । जबकि मंत्री बैधनाथ राम सभा अंतिम तक जमे रहे हालाँकि उन्होंने इस तरह की राजनीती को ही सही ठहरा दिया ।
बहरहाल इस राजनीती से स्थानीय बुजुर्ग खासे नाराज दिखे । राजनीती के इस खेल में शहीद की भावना तो आहत हुयी ही जनता को भी बाँट कर रख दिया ।
शहीदों की मजार में हर बरस मेले लगने की बात तो होती है लेकिन लोहरदगा में शहीदों की श्रधान्जली के लिए लगने वाला मेला राजनितिक अखाडा बन गया है राजनीती इतनी हावी रही की तीन दशक पुरानी संस्कृति तहस नहस हो गयी ।
लोहरदगा जिला के कुडू प्रखंड अंतर्गत टिको पोख्राटोली में लरका आन्दोलन के शहीद हलधर गिरधर के समाधी स्थल में हर वारस मेला लगने की परम्परा है पिछले तीन दशको से अधिक समय से यहाँ आदिवासी और सदन एक साथ श्रधान्जली देते है वैदिक मंत्रौच्चारण के साथ यज्ञ हवन और पूजा के साथ साथ सरना धर्म अनुसार शहीद मेले का आयोजन यहाँ की साझी संस्कृति रही है ।
दरअसल इसबार शहीद स्थल में मेला भी लगा और श्रधान्जली भी दी गयी लेकिन राजनीती हावी रही । वीर बुधु स्मारक समिति और आदिवासी छात्रा संघ ने अपने अपने मंच बना लिए स्मारक समिति ने जहाँ स्वस्थ मंत्री बैधनाथ राम को मुख्या अतिथि बनाया गया वही आदिवासी छात्रा संघ ने विधायक कमल किशोर को मुख्या अतिथि चुना बाद में राजनितिक हस्तझेप के नकारात्मक प्रभाव को देखते हुए विधायक कमल किशोर भगत श्रधान्जली अर्पित कर लौट गाये । जबकि मंत्री बैधनाथ राम सभा अंतिम तक जमे रहे हालाँकि उन्होंने इस तरह की राजनीती को ही सही ठहरा दिया ।
बहरहाल इस राजनीती से स्थानीय बुजुर्ग खासे नाराज दिखे । राजनीती के इस खेल में शहीद की भावना तो आहत हुयी ही जनता को भी बाँट कर रख दिया ।
मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010
बिन पैरों के दौड़ा राजधान
कहा जाता है कि इरादे बुलंद हो तो शारीरिक विकलांगता भी व्यक्ति के लिए कमजोरी नहीं बन सकती है इसे सच कर दिखाया है लोहरदगा के राजधान उराँव ने जो अपनी हौसले के बदौलत एक सफल मुकाम हासिल कर लिया है .
लोहरदगा के कुडू प्रखंड के सल्गिगओं निवासी राजधान उराँव . राजधान उराँव को जन्म से एक साल बाद ही पोलियो अटैक आया और राजधान उराँव उम्र भर के लिए पैर से विकलांग हो गए , बावजूद इसके राजधान ने अपनी दौर जरी रखी . अपने दैनिक कार्यो से लेकर शिक्षा तक के लिए राजधान ने खुद ही मशक्कत कि लेकिन परिवार कि आर्धिक तंगी के करण राजधान अपनी पठाई जरी नहीं रख पाए .
पढाई अधूरी रह जाने के बाद राजधान उराँव ने अपनी जीविका चलने के लिए व्यवसाय के क्षेत्र में कदम रख लिया , आज राजधान के पास छोटी मोती चार बिजनेस हाथ में है. .अपनी विकलांगता को लेकर जनप्रतिनिधियो तक ने उअसकी बात नहीं सुनी . सरकारी उपेक्षा ने राजधान को और मजबूती प्रदान कि यहाँ तक कि राजधान ने सरकारी ट्राई साईकल न लेकर अपनी कमाई से मोटर ड्राई साईकल ली और एक आदर्श के रूप में उभरा .
किस्मत ने तो राजधान उराँव कि जिन्दगी कि गाड़ी रोक ही दी थी । लेकिन अपनी इच्छाशक्ति के दम पर राजधान ने ऐसी दौड़ लगाई कि सफलता के नए ऊंचाई को छू लिया . शायद यही करण है कि सरकारी सहायता लेकर वाह और पंगु होना नहीं चाहता था.
लोहरदगा के कुडू प्रखंड के सल्गिगओं निवासी राजधान उराँव . राजधान उराँव को जन्म से एक साल बाद ही पोलियो अटैक आया और राजधान उराँव उम्र भर के लिए पैर से विकलांग हो गए , बावजूद इसके राजधान ने अपनी दौर जरी रखी . अपने दैनिक कार्यो से लेकर शिक्षा तक के लिए राजधान ने खुद ही मशक्कत कि लेकिन परिवार कि आर्धिक तंगी के करण राजधान अपनी पठाई जरी नहीं रख पाए .
पढाई अधूरी रह जाने के बाद राजधान उराँव ने अपनी जीविका चलने के लिए व्यवसाय के क्षेत्र में कदम रख लिया , आज राजधान के पास छोटी मोती चार बिजनेस हाथ में है. .अपनी विकलांगता को लेकर जनप्रतिनिधियो तक ने उअसकी बात नहीं सुनी . सरकारी उपेक्षा ने राजधान को और मजबूती प्रदान कि यहाँ तक कि राजधान ने सरकारी ट्राई साईकल न लेकर अपनी कमाई से मोटर ड्राई साईकल ली और एक आदर्श के रूप में उभरा .
किस्मत ने तो राजधान उराँव कि जिन्दगी कि गाड़ी रोक ही दी थी । लेकिन अपनी इच्छाशक्ति के दम पर राजधान ने ऐसी दौड़ लगाई कि सफलता के नए ऊंचाई को छू लिया . शायद यही करण है कि सरकारी सहायता लेकर वाह और पंगु होना नहीं चाहता था.
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