

इंसानी फितरत है कि नाउम्मीद में भी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ता । जेष्ठ की तपती दोपहरी हो, भादो की बौछार या माघ की कड़ाके की ठंड। मौसम की मार से बेखबर यह परिवार के लिए टाट ओढना, धरती बिछौना और खुला आसमान हीं छत है । यह परिवार दो साल से इस उम्मीद में खेत में तंबू लगाकर गुजर कर रहा है कि कभी तो इंसानियत का दिल पसीजेगा । समाज के रहनुमा या सरकारी हुक्मरान किसी की भी नजरें इनायत होगी । लेकिन अफसोस की अभी तक किसी ने यह पुछने की जहमत नही उठाई कि सडक के किनारे यह फटेहाल बसेरा किसका है । बीस साल ईट भटठे में कमाने खाने के बाद दो साल पहले जब केशव अपने गांव लौटा तो अपनों ने भी उससे मुह मोड़ लिया । सिर छुपाने की भी जगह नही मिली तो उसने एक खली पडे़ खेत में प्लास्टिक का तंबू गाड़ दिया । अपने तीन बच्चो को नैय्हर परवरिश के लिए छोड़ विरासमुनी गरीबी तंगहाली में भी पति इ सेवा में लगी है . पति पत्नी इस तम्बू में गुजर कर रहा है । मौसम की बेरहम चोट ने कइ दफा इसका बसेरा उड़ा दिया लेकिन जिवट केशव का संघर्ष जारी है । अधिकारियों के पास काफी गिड़गिड़ाने पर दो महिने तक राशन मिला और साथ हीं इंदिरा आवास का आश्वासन । अब अनाज भी बंद हो गया है और कोई भरोसा भी नही दिलाता कि उसे घर मिल जाएगा ।
दरअसल , गांव का वाशिंदा होने के बावजूद केशव के पास कोई ऐसा कागजी प्रमाण नही जिससे यह साबित कर पाए कि वह इसी गांव का है । दुसरी ओर कागज के दम पर चलने वाली सरकारी व्यवस्था में उसकी सुनने वाला कोई नहीं है ।वहीं जिले के अधिकारी जांच कर सुविधा मुहैया कराने की बात कह रहें है
बहरहाल , सुबे के हर परिवार को रोटी कपडा़ और मकान देने की बात करने वाले सरकार ऐसे व्यक्तियों के लिए रैन बसेरा का भी इंतजाम नही कर रखी है । लोहरदगा का केशव उरांव तो एक उदाहरण मात्र है ऐसे कितने केशव हैं जो खुले आसमान में जिंदगी जिने को मजबूर है और इन्हें कोई देखने सुनने वाला नहीं ।

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