रविवार, 14 नवंबर 2010

छठी माता का मंदिर

लोक आस्था के महा पर्व छठ हिन्दू धर्म में अलग महत्व रखता है यह एक मात्र ऐसा पर्व है जिसमे ना केवल उदयाचलगामी सूर्य कि पूजा कि जाती है बल्कि अस्ताचलगामी सूर्य को भी पूजा जाता है. हर साल चैत्र तथा कार्तिक में होने वाले छठ में सूर्य कि आराधना करते हुए छठी माता कि उपासना कि जाती है.लेकिन छठी माता का मंदिर अब तक दुर्लभ हीं रहा है. लोहरदगा के कस्बाई इलाके चट्टी में छठी माता का एक अनोखा और एकलौता मंदिर है. जो छठ पूजा के दौरान आस्था का प्रतीक बन गया है.
लोहरदगा से ३० किलोमीटर पूर्व दिशा में चट्टी बस्ती में स्थित है छतीस माता मंदिर. इसी छतीस माता मंदिर में स्थापित हैं छठी माता का मंदिर. छठी माता के साथ साथ भगवान सूर्य कि प्रतिमा भी स्थापित कि गई है. छठ पूजा के समय इस मंदिर का महत्त्व पुरे क्षेत्र में बढ़ जाता है. आस पास के पुरे इलाके में छठ व्रत करने वाली महिलाएं भगवान भास्कर को अर्घ्य देने के बाद इस मंदिर में छठी माता कि पूजा करने के लिए आती हैं. इस मंदिर को बने महज छह साल हीं हुए है और इस मंदिर में लोहरदगा सहित आस - पास के जिला से भी श्रद्धालु आते हैं. छह साल में हीं यह छतीस माता मंदिर और छठ माता मंदिर लोक आस्था और विश्वास का स्थल बन चूका है.
दरअसल, छठ पूजा में उदयाचलगामी और अस्ताचलगामी भगवान सूर्य को अर्घ्य देने का विधान है. छठ में भगवान सूर्य को अर्घ्य देते हुए महिलाओं द्वारा छठी माता का व्रत रखा जाता है. इससे पहले छठी माता का मंदिर प्रकाश में नहीं आया है. चट्टी का यह छठी माता मंदिर अपने आप में एकलौता मंदिर है जिसमे छठी माता के साथ सूर्य कि पूजा कि जाती है. यही कारण है कि छठ पर्व के दौरान छठव्रतियों को इस मंदिर में पूजा करना मनोकामना सिद्ध करने के सामान है.
बहरहाल,छह साल पहले बनाया गया यह मंदिर अपने अनोखे होने के कारण लोक आस्था का केंद्र बन गया है.इतना जरुर है कि छठ पर्व जिस उत्साह और बड़े तादाद में किया जाता है ऐसे में छठी माता का मंदिर हों एक लोक आवश्यकता जरुर रही है. जरुरत है ऐसे प्रयास और हो जिससे इस महापर्व कि सार्थकता सिद्ध हो..

विकलांग मुखिया

झारखण्ड में बत्तीस सालों बाद होने जा रहे पंचायत चुनाव ने उपेक्षित से रहे, तबकों में भी उतसाह का संचार कर दिया है. इसका ताजा उदाहरण लोहरदगा में देखने को मिल रहा है.लोहरदगा में पंचायत चुनाव के तीसरे चरण में विकलांगो ने अपने लिए एक अलग उम्मीदवार का चयन करते हुए पंचायत चुनाव में विकलांग युवक को जिला परिषद् के लिए नामांकन कराया है.
त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के तीसरे चरण का नामांकन जारी है. इस चरण में एक तरफ जहाँ कई रसूख और राजनीतक पृष्ठ भूमि वाले लोग मुखिया से लेकर जिला परिषद् के लिए उम्मीदवारी भर रहें हैं वहीँ लोहरदगा में जब एक विकलांग शामिल उरांव ने जिला परिषद् के लिए नामांकन पत्र दाखिल करने के लिए समाहरणालय पहुंचा तो सभी भौचक्के रह गए. शामिल उरांव भंडरा प्रखंड से जिला परिषद् के लिए नामांकन किए हैं. शामिल के नामिनेशन में भी भारी संख्या में प्रखंड के लोग शामिल हुए. जिसमे विकलांगो के साथ - साथ आम लोग भी आए. शामिल उरांव ने बताया कि जनप्रतिनिधियों ने विकलांगो कि हमेशा हीं उपेक्षा कि है जबकि विकलांग भी इसी समाज के अंग होते हैं. शामिल उरांव विकलांगो के हक़ और अधिकार के लिए काम करने कि इच्छा रखते हैं .
दरअसल,शामिल उरांव लोहरदगा जिला स्वावलंबी विकलांग संघ के अध्यक्ष भी हैं और शामिल उरांव ने विकलांगो के हक़ अधिकार के लिए पहले भी काम कर दिखाया है. शामिल ने लोहरदगा में विकलांगो के लिए विकलांगता एक्ट लागु करने प्रशासनिक भवनों को विकलांगों के लिए सुगम्य बनाने जैसे कई बड़े काम कर दिखाए हैं. कुछ यही कारण है कि आम लोगों ने भी शामिल उरांव को जिला परिषद् के नामिनेशन में सहमती के साथ सहयोग किया है. शामिल ने जिला परिषद् के साथ - साथ भंडरा प्रखंड के भंडरा प्रखंड से मुखिया पद के लिए भी उम्मीदवारी भरी है. शामिल को आम लोगों का भी भरपूर समर्थन मिल रहा है.
बहरहाल, शामिल उरांव लोहरदगा जिले के साथ - साथ पुरे झारखण्ड में पंचायत चुनाव का नामिनेशन करने वाले पहले विकलांग व्यक्ति हो सकते हैं . जो विकलांगो का प्रतिनिधित्व करते हुए राजनीति में कदम रख रहें हैं. निच्शित हीं इनके हौसले और इरादों कि दाद देनी होगी जो विकलांग होते हुए भी लोगो के लिए दौड़ना और काम करने का जज्बा रखता है. साथ हीं पंचायत चुनाव में शामिल कि उम्मीदवारी ने यह तो साबित किया हीं है कि पंचायत चुनाव बत्तीस सालों बाद झारखण्ड में लोकतंत्र कि एक नई इबारत लिखने जा रहा है.

गुरुवार, 4 नवंबर 2010

रिक्शों से विलुप्त होता शहर - लोहरदगा

लोहरदगा में रिक्शा संकट के दौर से गुजर रहा है.संकट भी इतना गहरा है कि लोहरदगा जिले में रिक्शा विलुप्ति के कगार पर पहुँच गया है. लोहरदगा से एक बड़ी संख्या में रिक्शा चालक पलायन कर गए हैं. और जो बचे हैं वो भी आज कल में बाहर जाने कि तैयारी में हैं.
लोहरदगा रांची के बीच बड़ी रेलवे लाइन क्या खुली लोहरदगा शहर से रिक्शा डिरेल्ड हो गई. लोहरदगा बड़ी रेलवे लाइन के चालू होने के बाद लोहरदगा में टेम्पो रिक्शा कि संख्या में काफी वृद्धि हुई जिसके कारण धीरे- धीरे रिक्शों कि संख्या में दिन ब दिन गिरावट आती गई . यही कारण है कि लोहरदगा से रिक्शा चालक रोजगार कि तलाश में पलायन करते जा रहे हैं. आज महज गिनती के हीं रिक्शा चालक लोहरदगा में रह गए हैं.जो है उनकी स्तिथि भी बद से बदतर हो गई है . बचे हुए रिक्शा चालक किसी तरह लोहरदगा में दिन काट रहे हैं. स्थानीय रिक्सा चालक किशुन नायक और बिनु महतो गंझू भगत बताते है कि आज दिन भर में सौ रूपा भी कमाना आफत हो गया है .
छोटी लाइन के समय लोहरदगा में रिक्शा रोजगार का एक बड़ा जरिया हुआ करता था. बड़ी रेलवे लाइन से पहले लोहरदगा शहर में दो हजार से अधिक रिक्शा होते थे. आज इन छह सालों में लोहरदगा में महज पचास कि संख्या में रिक्शा रह गए हैं. लोहरदगा में टेम्पो छोटी- बड़ी हर दुरी के लिए उपलब्ध हो गया है. ऐसे में रिक्शा के लिए कहीं भी राह नहीं रह जाती है. रिक्शा मोटिया संघ इसके पीछे लोहरदगा में व्यवहारिक सिस्टम का नहीं होना प्रमुख मानती है. रिक्शा मोटिया संघ शहर में रिक्शा और टेम्पो के लिए अलग-अलग रुट निर्धारित किए जाने कि मांग कर रही है.
बहरहाल, आज भी ग्रामीण क्षेत्रो से रोजगार कि तलाश में जब गाँव वाले शहर आते हैं तो सबसे पहले रिक्शा चलाकर हीं रोजगार कि शुरुआत करते हैं. लेकिन लोहरदगा में रिक्शा चालकों से जुड़े आकडे गाँव वालों को कहीं और पलायन करने को मजबूर कर रहे हैं. फिर भी लोहरदगा में रिक्शा के लिए एक निति कि जरुरत तो है जिससे ग्रामीण रोजगार का यह क्षेत्र लोहरदगा से ख़त्म ना हो जाए.

रविवार, 31 अक्टूबर 2010

शक्ति विग्रह

नव रात्र माँ दुर्गा के नवरूपो कि आराधना ,पूजा साधना का समय है. इन नौ दिनों में भक्त , तांत्रिक और साधक इन्हीं नौ रूपों कि पूजा अर्चना अलग - अलग पद्धतियों से करते हैं. लोहरदगा में माँ दुर्गा कि नौ रूपों से अलग एक दुर्लभ प्रतिमा है. जिसे शक्ति विग्रह के रूप में लोग पूजा करते हैं. इस नवरात्र के पुरे नौ दिनों तक अपनी मन्नतो और कामनाओ को लेकर माता के दरबार में भक्त श्रद्धा के साथ पूजा करते हैं.
लोहरदगा जिले के सीमांत से गुजरती कोयल नदी के तट पर निर्मित देवी उमा नाथ मंदिर. शहर और गाँव कि सीमा से हट कर सुनसान सी जगह में यह मंदिर ग्रामीण आस्था और विश्वास का एक प्रतिक स्थल बन गया है. स्थानीय ग्रामीणों में इस मंदिर को लेकर खास श्रद्धा और भक्ति है. इस मंदिर कि मनोकामना कि सिद्धि कि मिसाले खुद यहाँ के ग्रामीण हीं देते हैं. कई ग्रामीण हैं जिनकी पुत्र-पौत्र कि मनोकामनाए इस मंदिर से पूरी हुई है. इसी आस्था और विश्वास के स्थानीय ख्यति प्रचार कि बदौलत ग्रामीण मंदिरों में अपनी मनोकामना लेकर आते हैं. इस मंदिर से मांगी गई मनोकामना कभी भी विफल नहीं रही है, ऐसी मान्यता यहाँ के ग्रामीणों कि है...
दरअसल, इस मंदिर कि खासियत इस मंदिर में स्थापित प्रतिमा में है.प्रतिमा काले पत्थर कि है. एक शिला में माँ दुर्गा के साथ के साथ भगवन शिव गणेश, कार्तिके और माँ दुर्गा कि दोनों योगिनिया विराजमान है. इस प्रतिमा के विषय में ग्रामीण बताते है कि प्रतिमा कोयल नदी से स्वपन्न के अधर पर हीं मिली है.. जानकार प्रतिमा के शिल्प के आधार पर इसकी तुलना माँ छिन्नमस्तिका मंदिर रजरप्पा और माँ दुर्गा मंदिर देवडी से जोड़कर देखते हैं. यही कारण है कि नव रात्र के नौ दिनों तक इस मंदिर में भक्त अपनी मनोकामना लेकर आते हैं,साथ हीं वे लोग भी आते हैं जिनकी मनोकामना पूरी हो गई है. आखिर इस मंदिर में माँ दुर्गा के पूजा के साथ साथ भगवन शिव गणेश और कार्तिके कि पूजा भी हो जाती है. स्थानीय भक्त माता के इस रूप को मोक्ष्दायानी और मुक्ति दायनी मानते हैं.
यह प्राचीन मंदिर पुजारी पंडो से अब तक बची हुई है. यहाँ के स्थानीय ग्रामीण आदिवासी हीं मंदिर कि देख रेख करते हैं. लोहरदगा में हीं इसी प्रतिमा कि शिल्प और कला से मिलती जुलती मंदिर और प्रतिमाए हैं, जो पूरा तात्विक शोध के आधार पर ग्यारहवी सदी कि बताई जाती है. इसलिए इसकी पूरी सम्भावना है कि यह प्रतिमा भी ग्यारहवी सदी के आस पास कि हो. हालाकिं स्थानीय प्रशासन के द्वारा इस प्रतिमा के शोध और संरक्षण के प्रयास अभी बाकि है. जिससे इस मंदिर कि ख्यति स्थानीयता कि सीमाओं से बहार नहीं निकल पा रही है...

मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010

आस्था के कई मिथक तोड़ती है यह मंदिर

यूँ तो भारत में कई अनूठे मंदिर भरे - पड़े हैं . लोहरदगा में भी ऐसा हीं एक मंदिर है जो शिल्प और दर्शन में अनोखा है... मंदिर में माँ दुर्गा कि दो प्रतिमाओं कि पूजा एक साथ कि जाती है. नवरात्र के महीने और दशहरा के त्योहार पर यह मंदिर और भी खास हो जाता है
लोहरदगा शहर से २५ किलो मीटर दूर रांची जिला के सीमांत छोटा सा क़स्बा है चट्टी, इसी चट्टी में है मा दुर्गा का अनोखा मंदिर . इस मंदिर का नाम है छत्तीस माता मंदिर . इस छत्तीस माता मंदिर कि खासियत है मंदिर में स्थापित माँ दुर्गा कि प्रतिमा . मंदिर के एक हीं कमरे में माँ दुर्गा कि दो प्रतिमाएं स्थापित कि गई है. माँ दुर्गा कि एक प्रतिमा है जो विशाल स्वरूप में है और एक प्रतिमा जो आकार में छोटी है.इस मंदिर कि स्थापना करने वाले जगतपाल बताते है .कि माँ दुर्गा दस भुजाओ के साथ संहारक रूप में पापीयों का दमन के लिए और माँ दुर्गा का छोटा रूप संसार में सुख शांति कि स्थापना के लिए है.
नवरात्र में दुर्गा के नौ रूपों कि पूजा अर्चना कि जाती है. इस लिए भी नव रात्र में छत्तीस माता मंदिर का महत्व काफी बढ़ जाता है. हालाकिं मंदिर माता कि दो प्रतिमाएं हैं लेकिन पूजा दोनों प्रतिमाओं कि एक साथ कि जाती है मंदिर को स्थानीय लोग मनोकामना सिद्धि का मंदिर मानते हैं. मनोकामनाएं पूरी होने के साथ हीं मंदिर के प्रति लोगो में आस्था और विश्वास बढ़ता जा रहा है .यही कारण है कि महिलाएं नवरात्री में इस मंदिर में विशेष पूजा अनुष्ठान के लिए आती हैं पुरे नव रात्र इस मंदिर में पूजा और जागरण किया जाता है.
इस छत्तीस माता मंदिर के ठीक बीच के कमरे में माँ दुर्गा कि स्थापित दोनों प्रतिमाएं कई मिथकों को दोड़ते हुए , आस्था और विश्वास कि नई परिभाषा गढ़ती है.. इस तरह यह मंदिर पुरे भारत में अपनी तरह का एकलौता मंदिर है, जो नई सोच और दर्शन का परिणाम है ,

शनिवार, 6 फ़रवरी 2010

ममता का आँचल

देश में बच्ची बचाओ आन्दोलन चल रहा है फिर भी बच्चियों पर तिरस्कार का कहर जरी है । ऐसा ही मामला है लोहरदगा में देखने को मिला जब पॉँच साल की बेटी को ट्रेन में चढ़ा कर बाप ने छोड़ दिया ।
पॉँच साल की पूजा को उसके पिता ने रांची से लोहरदगा आ रही ट्रेन में बिठा कर खुद कहीं उतर गया । रांची से जब लोहरदगा पहुंची ट्रेन तो अपनी पिता को नहीं देख पूजा रोने लगी । जिसे देख किसी का दिल नहीं पसिझा तो उसी ट्रेन में रांची से आ रही रिटार्यड फौजी की पत्नी प्रेम मणि मिंज ने लड़की को लेकर स्टेसन मास्टर के पास पहुंची और एनाउंस करवया कई एक बार एनाउंस के बाद बाद भी कोई नहीं आया तो स्टेसन मास्टर ने लड़की को यह कहकर की किसी के आने के बाद लड़की को ले लेंगे । इस बाबत प्रेम मणि ने लड़की के घर तक पहुचने के लिए सदर थाने में भी रिपोर्ट की पर आज तक कोई नहीं आया । अब पूजा प्रेम मणि की पाचवी लड़की के रूप में ममता की परवरिश पा रही है ।पूजा अपने शहर का नाम रांची डोरंडा और पिता संतोस माँ दुर्गी का नाम याद है कहती है की पापा रिक्शा चलते हैं और माँ को रोज मारते हैं । अब हम घर नहीं जायेंगे यही बड़ी माँ के साथ रहेंगे । प्रेम मणि को अपनी बड़ी माँ कहती है और मुहल्ले के बच्चो के साथ - साथ खेलती अपनी भोली सूरत से घर ही नहीं महल्ले वासियो की भी चहेती बन गई है. प्रेम मणि के घर के आँगन में तो प्रेम का दृश्य देखते बनती है जब एक साथ जिमी शेरू बकरी के मेमना खेलते नजर आते हैं. तो भला इस घर को छोड़ पूजा कहाँ जाना चाहेगी .
बहरहाल प्रेम की गोद में पूजा उन लोगो के लिए सवाल है जो बेटा और बेटी में फर्क समझते हैं। जबकि अभी भी ममता के आँचल ममत्व से इतने भरे हैं की बच्ची पैदा करने वाली कोखों वाली माँ बौनी दिखाती है .

एक आवाज तो उठी है ..... दाद तो दीजिये .

आज महिलाओं को आधी आबादी कि संज्ञा दी जा रही है। लेकिन इस आधी आबादी को पूरा अधिकार नहीं मिल रहा है । अपनी शिक्षा के पूरी अधिकार के लिए लोहरदगा में महिलाओं ने एक आन्दोलन कि शुरुआत कर सभी को झकझोरने का प्रयास कर रही है ।
लोहरदगा के ये बच्चियां पहली बार अपने उंच्च शिक्षा के अधिकार और दुर्दशा के लिए आवाज उठा रही है। लोहरदगा के राजनितिक छवियो सामाजिक कार्यकर्ताओ पूंजीपतियो और शिक्षा विडो के सामने ये बच्चियां यही सवाल कर उठा रही है कि आखिर मुझे शिक्षा कयूं नहीं ? शिक्षको और बच्चियो कि मने तो उनमे आसमान छूने कि जूनून तो है लेकिन व्यवस्था और सुविधाओ के आभाव उन्हें शहर कि काल कोठरी से निकालने नहीं देती है ।
लोहरदगा में महिला उंचच शिक्षा को लेकर सामाजिक प्रशासनिक और राजनैतिक प्रयास अब तक नहीं हुए हैं। लोहरदगा जिले में अगर महिलाओ कि स्तिथि कि बात कि जाए तो करीब नब्बे हजार से अधिक महिला मतदाता हैं इसलिए भी तमाम मुद्दों के साथ राजनीतिज्ञों से सवाल उठ रहे हैं। कि आखिर शिक्षा सम्बन्धी उनके आशावासनो का क्या हुआ ।
बहरहाल लोहरदगा में महिला उंचच शिक्षा के तमाम सवालों के पीछे करण यही है कि यहाँ महिला शिक्षा के नाम पर मात्र एक कालेज है जहाँ १२वी तक कि पढाई होती है , यह स्तिथि पिछले तीस सालों से बरकार है । पहली बार अधिकार कि आवाज ने आन्दोलन किया है । शायद इस दस्तक से कोई राह खुल जाए ।

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

शहीद का दर्द और राजनीती

शहीदों के माजर पर लगेगे हर वर्ष मेले , वतन पर मरने वालों का यही आखरी निशां होगा

शहीदों की मजार में हर बरस मेले लगने की बात तो होती है लेकिन लोहरदगा में शहीदों की श्रधान्जली के लिए लगने वाला मेला राजनितिक अखाडा बन गया है राजनीती इतनी हावी रही की तीन दशक पुरानी संस्कृति तहस नहस हो गयी ।
लोहरदगा जिला के कुडू प्रखंड अंतर्गत टिको पोख्राटोली में लरका आन्दोलन के शहीद हलधर गिरधर के समाधी स्थल में हर वारस मेला लगने की परम्परा है पिछले तीन दशको से अधिक समय से यहाँ आदिवासी और सदन एक साथ श्रधान्जली देते है वैदिक मंत्रौच्चारण के साथ यज्ञ हवन और पूजा के साथ साथ सरना धर्म अनुसार शहीद मेले का आयोजन यहाँ की साझी संस्कृति रही है ।
दरअसल इसबार शहीद स्थल में मेला भी लगा और श्रधान्जली भी दी गयी लेकिन राजनीती हावी रही । वीर बुधु स्मारक समिति और आदिवासी छात्रा संघ ने अपने अपने मंच बना लिए स्मारक समिति ने जहाँ स्वस्थ मंत्री बैधनाथ राम को मुख्या अतिथि बनाया गया वही आदिवासी छात्रा संघ ने विधायक कमल किशोर को मुख्या अतिथि चुना बाद में राजनितिक हस्तझेप के नकारात्मक प्रभाव को देखते हुए विधायक कमल किशोर भगत श्रधान्जली अर्पित कर लौट गाये । जबकि मंत्री बैधनाथ राम सभा अंतिम तक जमे रहे हालाँकि उन्होंने इस तरह की राजनीती को ही सही ठहरा दिया ।
बहरहाल इस राजनीती से स्थानीय बुजुर्ग खासे नाराज दिखे । राजनीती के इस खेल में शहीद की भावना तो आहत हुयी ही जनता को भी बाँट कर रख दिया ।

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

बिन पैरों के दौड़ा राजधान

कहा जाता है कि इरादे बुलंद हो तो शारीरिक विकलांगता भी व्यक्ति के लिए कमजोरी नहीं बन सकती है इसे सच कर दिखाया है लोहरदगा के राजधान उराँव ने जो अपनी हौसले के बदौलत एक सफल मुकाम हासिल कर लिया है .
लोहरदगा के कुडू प्रखंड के सल्गिगओं निवासी राजधान उराँव . राजधान उराँव को जन्म से एक साल बाद ही पोलियो अटैक आया और राजधान उराँव उम्र भर के लिए पैर से विकलांग हो गए , बावजूद इसके राजधान ने अपनी दौर जरी रखी . अपने दैनिक कार्यो से लेकर शिक्षा तक के लिए राजधान ने खुद ही मशक्कत कि लेकिन परिवार कि आर्धिक तंगी के करण राजधान अपनी पठाई जरी नहीं रख पाए .
पढाई अधूरी रह जाने के बाद राजधान उराँव ने अपनी जीविका चलने के लिए व्यवसाय के क्षेत्र में कदम रख लिया , आज राजधान के पास छोटी मोती चार बिजनेस हाथ में है. .अपनी विकलांगता को लेकर जनप्रतिनिधियो तक ने उअसकी बात नहीं सुनी . सरकारी उपेक्षा ने राजधान को और मजबूती प्रदान कि यहाँ तक कि राजधान ने सरकारी ट्राई साईकल न लेकर अपनी कमाई से मोटर ड्राई साईकल ली और एक आदर्श के रूप में उभरा .
किस्मत ने तो राजधान उराँव कि जिन्दगी कि गाड़ी रोक ही दी थी । लेकिन अपनी इच्छाशक्ति के दम पर राजधान ने ऐसी दौड़ लगाई कि सफलता के नए ऊंचाई को छू लिया . शायद यही करण है कि सरकारी सहायता लेकर वाह और पंगु होना नहीं चाहता था.