गुरुवार, 4 नवंबर 2010

रिक्शों से विलुप्त होता शहर - लोहरदगा

लोहरदगा में रिक्शा संकट के दौर से गुजर रहा है.संकट भी इतना गहरा है कि लोहरदगा जिले में रिक्शा विलुप्ति के कगार पर पहुँच गया है. लोहरदगा से एक बड़ी संख्या में रिक्शा चालक पलायन कर गए हैं. और जो बचे हैं वो भी आज कल में बाहर जाने कि तैयारी में हैं.
लोहरदगा रांची के बीच बड़ी रेलवे लाइन क्या खुली लोहरदगा शहर से रिक्शा डिरेल्ड हो गई. लोहरदगा बड़ी रेलवे लाइन के चालू होने के बाद लोहरदगा में टेम्पो रिक्शा कि संख्या में काफी वृद्धि हुई जिसके कारण धीरे- धीरे रिक्शों कि संख्या में दिन ब दिन गिरावट आती गई . यही कारण है कि लोहरदगा से रिक्शा चालक रोजगार कि तलाश में पलायन करते जा रहे हैं. आज महज गिनती के हीं रिक्शा चालक लोहरदगा में रह गए हैं.जो है उनकी स्तिथि भी बद से बदतर हो गई है . बचे हुए रिक्शा चालक किसी तरह लोहरदगा में दिन काट रहे हैं. स्थानीय रिक्सा चालक किशुन नायक और बिनु महतो गंझू भगत बताते है कि आज दिन भर में सौ रूपा भी कमाना आफत हो गया है .
छोटी लाइन के समय लोहरदगा में रिक्शा रोजगार का एक बड़ा जरिया हुआ करता था. बड़ी रेलवे लाइन से पहले लोहरदगा शहर में दो हजार से अधिक रिक्शा होते थे. आज इन छह सालों में लोहरदगा में महज पचास कि संख्या में रिक्शा रह गए हैं. लोहरदगा में टेम्पो छोटी- बड़ी हर दुरी के लिए उपलब्ध हो गया है. ऐसे में रिक्शा के लिए कहीं भी राह नहीं रह जाती है. रिक्शा मोटिया संघ इसके पीछे लोहरदगा में व्यवहारिक सिस्टम का नहीं होना प्रमुख मानती है. रिक्शा मोटिया संघ शहर में रिक्शा और टेम्पो के लिए अलग-अलग रुट निर्धारित किए जाने कि मांग कर रही है.
बहरहाल, आज भी ग्रामीण क्षेत्रो से रोजगार कि तलाश में जब गाँव वाले शहर आते हैं तो सबसे पहले रिक्शा चलाकर हीं रोजगार कि शुरुआत करते हैं. लेकिन लोहरदगा में रिक्शा चालकों से जुड़े आकडे गाँव वालों को कहीं और पलायन करने को मजबूर कर रहे हैं. फिर भी लोहरदगा में रिक्शा के लिए एक निति कि जरुरत तो है जिससे ग्रामीण रोजगार का यह क्षेत्र लोहरदगा से ख़त्म ना हो जाए.

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