शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

जल हीं जीवन है..

धरती के कोख में छुपे पानी के स्रोत को ढूंढ़ लेते हैं लोहरदगा जिले के रिटायर्ड शिक्षक लालमोहन केशरी। जमीन के निचे पानी को बांस की छड़ी और नारियल के स्तिथि से बतातें हैं की कहा कहाँ पानी का स्रोत ज्यादा है और कहा पर पत्थल निकलने वाला है।
चैकिए नही ये इस बांस की छड़ी से पानी की सतह खोज रहें हैं सुनने और देखने में अटपटा जरूर लग रहा होगा लेकिन ये रिटायर्ड शिक्षक छड़ी बच्चे के उपर नहीं उठा रहें हैं बल्कि लोगों की प्यास बुझाने के लिए छड़ी उठाए इधर उधर पानी की तलाश कर रहें हैं साठे चार फीट के बांस की छड़ी में दो फीट का चीड़ा लगाकर ये हाथें में लिए छड़ी को उपर निचे कर रहें हैं और तीन चार जगह को चिन्हित कर इट के छोटे टुकरे से निशान बना रहें हैं उसके बाद चिन्हित किए जगहों पर नारियल को लेकर हाथ की तलहथी में ले जाते हैं फिर किसी एक जगह को चिन्हित कर लोहे का कील ठोक देते हैं और अब यही जगह में बोरिग के लिए चुना जाता है। इस पुरे चयन प्रक्रिया क लिए बताते हैं की धरती के निचे छिपे पानी की सतह को खोजने की यह विधी बहुत पुरानी है। दरअसल यह मैगनेटिक थियूरी पर काम करता है। पानी की सतह की जानकारी के लिए साठे चार फीट का बांस की छड़ी लेते हैं जिसमें दो फीट का चीरा लगाते हैं। और बांस के चीरे को मोड़ कर टेंसन पैदा करते हैं। वे बताते हैं कि पत्थल के साथ हरे बांस का रिपलसन है जिसके कारण हाथ में जब बांस को लेकर चलते हैं तो बांस का उछाल उपर की ओर अधिक होता है वहीं पानी के साथ अट्रेक्शन है जिसके करण पानी मिलने पर निचे की ओर स्वत झुकाव अधिक होता है। इस तरह बांस की छड़ी से पानी की सतह की तलाशि तीन चार जगहो में की जाती है फिर नारियल से पानी की सतह के अधिकता की जानकारी की जाती है।
लालमोहन केशरी लोहरदगा हीं नही बल्कि कइ राज्यों में ये पानी की सतह की जानकारी के लिए जाते हैं पिछले 35 वषों से ये पानी की तलाशी का काम कर रहें हैं ये बिहार उड़ीसा छत्तीसगढ के क्षेत्र में भी जा चुके हैं ।